Sunday, 24 December 2023

 बुरे समय का भी समय है


बुरे समय का भी समय है

ये जाएगा ये भी तय है


हमको रोना या हँसना है

करना हमको ही निर्णय है


यद्यपि स्वर बाधा करता है

शांत सुनें उसमें भी लय है


कोहरा, शोक, अंधेरा कब तक

रहे हैं शास्वत, क्या संशय है


सृजन नव्यता, नींव गठन हित

टूटन विघटन प्रलय निश्चय है


द्वंद प्रतिबंध में जो हंसता

उसकी निश्चित ही ‘जय’ जय है

Tuesday, 19 December 2023

तजता नहीं हूँ हाँ धैर्य पथ मैं

 ठोकर लगी हैं कई बार पथ में

चलता रहा हूँ मगर पूर्ववत मैं


हो बिघ्न बाधा सम्मुख बड़ी ही

झुकता नहीं हूं पर होके नत मैं


है ये परीक्षा यही मानकर ही

देता हूँ अपना शत प्रतिशत मैं


हाँ पैर बेशक होते हैं जख्मी

होने न देता मन क्षत विक्षत मैं


कितना बुरा ही क्यों हो न जाये

तजता नहीं हूँ हाँ धैर्य पथ मैं

जयवर्धन काण्डपाल 

Sunday, 25 February 2018

वो शख्स मेरे मकान को घर कह गया


वो शख्स मेरे मकान को घर कह गया,
कमाल सजाने वाले का हुनर कह गया.

मैं तंग हूँ यहाँ की बोझिल हवा,फिजा से
एक वो है इसे बेमिसाल शहर कह गया.

अधूरी बनाई बरसों की तस्वीर देखी जो,
मुकम्मल करने में न रखना कसर कह गया.

अपने आप में रहने की आदत को देख,
घुटन भरी जिंदगी को जहर कह गया.

नायाब है कोई चीज तो तारीफ़ करो भी,
मिलता नहीं हर पल ये अवसर कह गया.

बुलंद हैं इरादे तो मंजिल भी मिलेगी"जय"
ठोकरों से थमे ना कभी सफर कह गया.
           जयवर्धन

भूख प्यास के इर्द गिर्द


रोटी की छोड़ मुहब्बत के लिए वक्त न मिला मुझको,
मेरे पेट ने हर एक दिन दिया यही कुछ सिला मुझको.

इन हसीनाओं की अदाएं कर दें चकाचौंध तुझको भी,
ये कौंधती बिजलियाँ मगर नहीं पाती हैं हिला मुझको.

रोज की महंगाई मेरे सपनों को लील जाती एक-२ कर,
होंगे पूरे एक दिन ये झूठे आश्वासन मत दिला मुझको.

अपनी झोपड़ी को धूप, तूफ़ान से बचाने में मशगूल हूँ,
क्या ही अपनी और खींचेगा कोई भव्य किला मुझको.

सूखे पड़े कुंएं,नल औ नाले और ज्यादा प्यास बढ़ाते हैं,
एक घूँट पानी दे दे ये अंगूरी रसायन मत पिला मुझको.

मेरी भूख औ प्यास सब कुछ भूल जायेगी देखना 'जय',
तभी तो कहता हूँ तू अपनी सौगंध मत खिला मुझको.
..........................जयवर्धन................................

Pen art











Saturday, 13 April 2013

उसको ही नहीं आती है आज मेरी हंसी रास, जो कल तक मेरे काँधे पे रखके सर रोता था.


मैं पहले जब कभी भी फूट फूटकर रोता था,
पलभर बाद मेरे साथ मेरा पूरा घर रोता था.

सबको हो जाती थी खबर रोने की वजह की,
मैं भले ही माँ के आँचल में छुपकर रोता था.

किसी यार के साथ हो जाए जो झगड़ा कभी,
बस क्या था वो उधर रोता, मैं इधर रोता था.

अब मोम के मन भी नहीं पिघलते जरा भी,
मेरे रोने पर भले पहले कभी पत्थर रोता था.

उसको ही नहीं आती है आज मेरी हंसी रास,
जो कल तक मेरे काँधे पे रखके सर रोता था.

पहले दुल्हन रो रोकर बुरा हाल करती थी तो,
पूरा गाँव भी उसका यूं रोना देखकर रोता था.

अब तो जमाना बस खुद की पीर समझता है
तब जमाना सबकी पीड़ा समझकर रोता था.
...............जयवर्धन काण्डपाल 'जय'.......