मैं पहले जब कभी भी फूट फूटकर रोता था,
पलभर बाद मेरे साथ मेरा पूरा घर रोता था.
सबको हो जाती थी खबर रोने की वजह की,
मैं भले ही माँ के आँचल में छुपकर रोता था.
किसी यार के साथ हो जाए जो झगड़ा कभी,
बस क्या था वो उधर रोता, मैं इधर रोता था.
अब मोम के मन भी नहीं पिघलते जरा भी,
मेरे रोने पर भले पहले कभी पत्थर रोता था.
उसको ही नहीं आती है आज मेरी हंसी रास,
जो कल तक मेरे काँधे पे रखके सर रोता था.
पहले दुल्हन रो रोकर बुरा हाल करती थी तो,
पूरा गाँव भी उसका यूं रोना देखकर रोता था.
अब तो जमाना बस खुद की पीर समझता है
तब जमाना सबकी पीड़ा समझकर रोता था.
...............जयवर्धन काण्डपाल 'जय'.......