Sunday, 25 February 2018

वो शख्स मेरे मकान को घर कह गया


वो शख्स मेरे मकान को घर कह गया,
कमाल सजाने वाले का हुनर कह गया.

मैं तंग हूँ यहाँ की बोझिल हवा,फिजा से
एक वो है इसे बेमिसाल शहर कह गया.

अधूरी बनाई बरसों की तस्वीर देखी जो,
मुकम्मल करने में न रखना कसर कह गया.

अपने आप में रहने की आदत को देख,
घुटन भरी जिंदगी को जहर कह गया.

नायाब है कोई चीज तो तारीफ़ करो भी,
मिलता नहीं हर पल ये अवसर कह गया.

बुलंद हैं इरादे तो मंजिल भी मिलेगी"जय"
ठोकरों से थमे ना कभी सफर कह गया.
           जयवर्धन

भूख प्यास के इर्द गिर्द


रोटी की छोड़ मुहब्बत के लिए वक्त न मिला मुझको,
मेरे पेट ने हर एक दिन दिया यही कुछ सिला मुझको.

इन हसीनाओं की अदाएं कर दें चकाचौंध तुझको भी,
ये कौंधती बिजलियाँ मगर नहीं पाती हैं हिला मुझको.

रोज की महंगाई मेरे सपनों को लील जाती एक-२ कर,
होंगे पूरे एक दिन ये झूठे आश्वासन मत दिला मुझको.

अपनी झोपड़ी को धूप, तूफ़ान से बचाने में मशगूल हूँ,
क्या ही अपनी और खींचेगा कोई भव्य किला मुझको.

सूखे पड़े कुंएं,नल औ नाले और ज्यादा प्यास बढ़ाते हैं,
एक घूँट पानी दे दे ये अंगूरी रसायन मत पिला मुझको.

मेरी भूख औ प्यास सब कुछ भूल जायेगी देखना 'जय',
तभी तो कहता हूँ तू अपनी सौगंध मत खिला मुझको.
..........................जयवर्धन................................

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