Tuesday, 4 September 2012

आलोचना


हर बात के लिए वैसे कायदा कानून बना है.
उड़ती हैं धज्जियाँ अपना रोज का देखना है .

वो सलीके से उस बोर्ड का फोटो खींचता है.
जिस पे लिखा है 'यहाँ फोटो खींचना मना है'.

तमाशबीनों का कैसा जमवाड़ा लगा है देखो,
एक चींटी का हाथी से खुलेआम सामना है.

झोपडियां तोड़ के मॉल का शिलान्यास हुआ,
हर तरफ हो रही इसकी बहुत आलोचना है .

कल रात कोई बेबस अँधेरी गली में लुटा है,
सुना है कि पास में कोई नया थाना बना है.

काँपता क्यों है मेरे पास आने से वो 'जय'.
जब से पता चला उसे कि मेरे पास आइना है.
......................जय.............................

Wednesday, 15 August 2012

जब हुआ उनसे यकायक सामना,


जब हुआ उनसे यकायक सामना,
हो गया मुशकिल  कलेजे को थामना.


छू लिया जो प्यार से उन्होंने मुझे,
रह गया खड़ा पत्थर की मूरत सा बना.

रोक देता वक्त को वहीँ का वहीँ,
होता अगर मेरे हाथों में वक्त का टालना.

उन्होंने यूँ मिलकर उम्र बढा दी हमारी,
वर्ना तो बढ़ रही थी मरने की संभावना.

जीवन में ये पल आया तो मन को लगा,
की बेकार नहीं गया एक अरमान पालना

सींच आंसुओं से खुशी न रख सीने को बंजर


कर ह्रदय को मजबूत लड़ दर्द से निरंतर.
मौन से होता है गर शब्दों को कंठ में भर.

पतझड़ तो कुछ क्षण का आगे तो बसंत है,
उम्मीद के दिए से कर रोशन तू हर मंजर.

गम की सीलन से नम है कलेजे की जमीन
सींच आंसुओं से खुशी न रख सीने को बंजर.

जन्म था तय अगर सफर भी निश्चित है तय,
मंजिल भी मिलेगी गर रखा गया जारी सफर. 

जिंदगी से जीत सकता है तो जीत जा ‘जय’
मौत से जीतेगा ना तू ना ही सम्राट सिकंदर.  
..................जयवर्धन............................

गांव वो अब वीराने हो गए हैं.


परिंदे अब सयाने हो गए हैं.
फिजूल फैंके दाने हो गए हैं.

अब नए-२ आजमाओ तरीके,
ढंग तुम्हारे पुराने हो गए हैं.

मत डरो बदनामी के खौफ से,
लोग अपने अनजाने हो गए हैं.

जिनको सिखाया तीर चलाना,
हम ही उनके निशाने हो गए हैं.

हर मौसम में खिलखिलाते थे,
गांव वो अब वीराने हो गए हैं.

मुझे न भेजिए कोई चिठ्ठी पत्री,
बंजारों से मेरे ठिकाने हो गए हैं.

अब नहीं उनके लौटने की उम्मीद,
आदमी वो जाने माने हो गए हैं.
...............जयवर्धन...........

Wednesday, 11 July 2012


रोटी की छोड़ मुहब्बत के लिए वक्त न मिला मुझको,
मेरे पेट ने हर एक दिन दिया यही कुछ सिला मुझको.

इन हसीनाओं की अदाएं कर दें चकाचौंध तुझको भी,
ये कौंधती बिजलियाँ मगर नहीं पाती हैं हिला मुझको.

रोज की महंगाई मेरे सपनों को लील जाती एक-२ कर,
होंगे पूरे एक दिन ये झूठे आश्वासन मत दिला मुझको.

अपनी झोपड़ी को धूप, तूफ़ान से बचाने में मशगूल हूँ,
क्या ही अपनी और खींचेगा कोई भव्य किला मुझको.

सूखे पड़े कुंएं,नल औ नाले और ज्यादा प्यास बढ़ाते हैं,
एक घूँट पानी दे दे ये अंगूरी रसायन मत पिला मुझको.

मेरी भूख औ प्यास सब कुछ भूल जायेगी देखना 'जय',
तभी तो कहता हूँ तू अपनी सौगंध मत खिला मुझको.
..........................जयवर्धन................................

Tuesday, 27 March 2012

एक हम ही थे उनके संगे साथी

एक हम ही थे उनके संगे साथी
वो उनके संघर्ष के सफर के.
जीत के जश्न में एक हम ही नही थे
भले लोग बहुत थे इधर उधर के.