Wednesday, 15 August 2012

जब हुआ उनसे यकायक सामना,


जब हुआ उनसे यकायक सामना,
हो गया मुशकिल  कलेजे को थामना.


छू लिया जो प्यार से उन्होंने मुझे,
रह गया खड़ा पत्थर की मूरत सा बना.

रोक देता वक्त को वहीँ का वहीँ,
होता अगर मेरे हाथों में वक्त का टालना.

उन्होंने यूँ मिलकर उम्र बढा दी हमारी,
वर्ना तो बढ़ रही थी मरने की संभावना.

जीवन में ये पल आया तो मन को लगा,
की बेकार नहीं गया एक अरमान पालना

सींच आंसुओं से खुशी न रख सीने को बंजर


कर ह्रदय को मजबूत लड़ दर्द से निरंतर.
मौन से होता है गर शब्दों को कंठ में भर.

पतझड़ तो कुछ क्षण का आगे तो बसंत है,
उम्मीद के दिए से कर रोशन तू हर मंजर.

गम की सीलन से नम है कलेजे की जमीन
सींच आंसुओं से खुशी न रख सीने को बंजर.

जन्म था तय अगर सफर भी निश्चित है तय,
मंजिल भी मिलेगी गर रखा गया जारी सफर. 

जिंदगी से जीत सकता है तो जीत जा ‘जय’
मौत से जीतेगा ना तू ना ही सम्राट सिकंदर.  
..................जयवर्धन............................

गांव वो अब वीराने हो गए हैं.


परिंदे अब सयाने हो गए हैं.
फिजूल फैंके दाने हो गए हैं.

अब नए-२ आजमाओ तरीके,
ढंग तुम्हारे पुराने हो गए हैं.

मत डरो बदनामी के खौफ से,
लोग अपने अनजाने हो गए हैं.

जिनको सिखाया तीर चलाना,
हम ही उनके निशाने हो गए हैं.

हर मौसम में खिलखिलाते थे,
गांव वो अब वीराने हो गए हैं.

मुझे न भेजिए कोई चिठ्ठी पत्री,
बंजारों से मेरे ठिकाने हो गए हैं.

अब नहीं उनके लौटने की उम्मीद,
आदमी वो जाने माने हो गए हैं.
...............जयवर्धन...........